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इंदौर

पंचकुइया मोक्ष धाम स्थित भूतेश्वर महादेव मंदिर पर न तो भगवान भोलेनाथ को हल्दी-मेहंदी लगेगी और न ही होगा विवाह

शास्त्रीय संगीत से रिझाएंगे शिव को होलकर शासनकाल में हुई थी मंदिर की स्थापना

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पंचकुइया मोक्ष धाम स्थित भूतेश्वर महादेव मंदिर पर न तो भगवान भोलेनाथ को हल्दी-मेहंदी लगेगी और न ही होगा विवाह,       शास्त्रीय संगीत से रिझाएंगे शिव को
होलकर शासनकाल में हुई थी मंदिर की स्थापना, 88 वर्षों से चली आ रही संगीत से शिव आराधना की परम्परा – इस बार भी आएंगे नामी कलाकार

इन्दौर। शहर के पश्चिम क्षेत्र, पंचकुइया मोक्षधाम स्थित श्री भूतेश्वर महादेव मंदिर संभवतः शहर का एकमात्र ऐसा शिव मंदिर है जहाँ शिवरात्रि पर भोले बाबा के विवाह से संबंधित कोई भी रस्म होने के बजाय शास्त्रीय संगीत निशा का दिव्य आयोजन होते आ रहा है। होलकर शासनकाल में करीब 300 वर्ष पहले स्थापित इस मंदिर में यह परम्परा करीब 88 वर्ष पुरानी है। मोक्ष धाम अर्थात स्मशान घाट का क्षेत्र होने के कारण यह मान्यता है कि यहाँ आने वाले पार्थिव शरीर भगवान शिव की दृष्टि पड़ने से सहज ही मोक्ष को प्राप्त होते हैं। इस प्राचीन मंदिर पर चारों प्रहर पूजा का भी विशेष प्रावधान है। इस बार भी 15 फरवरी को वैदिक मंत्रोच्चार, शैव आगमिक विधि और पारम्परिक पूजन संस्कारों की सात्विक धारा के बीच चारों प्रहर पूजा होगी।
मंदिर के मुख्य पुजारी पं. श्री हरीशानंद तिवारी एवं आचार्य पं. यतीन्द्र तिवारी ने बताया कि प्रतिवर्ष भूतेश्वर महादेव मंदिर पर महाशिवरात्रि का पर्व विशेष गरिमा और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। अन्य मन्दिरों में जहां हल्दी, मेहँदी, उबटन, केसर जल आदि से दूल्हे को स्नान कराने और अन्य विवाहोत्सव की लोक परम्पराएं होती हैं लेकिन यह शहर का ऐसा एकमात्र मन्दिर है जहां शास्त्रों में वर्णित महाशिवरात्रि का स्वरुप और अधिक व्यापक एवं गंभीर माना जाता है। लिंग पुराण में वर्णन मिलता है कि इसी रात्रि को अनंत ज्योति स्तम्भ के रूप में शिव का प्राकट्य हुआ है। इसे लिंगोद्भव भी कहा गया है। यह प्रसंग इस तथ्य का प्रतीक है कि भगवान शिव न आदि है, न अंत, वे स्वयं प्रकाश स्वरुप चेतना हैं। शिवरात्रि उसी अनंत सत्ता के स्मरण और आत्मबोध की साधना का अवसर है। इसी प्रकार शिव पुराण में भी चार प्रहार पूजा का विधान बताया गया है, उसका पालन करते हुए भूतेश्वर महादेव मन्दिर में 15 फरवरी को प्रथम प्रहर में जलाभिषेक, द्वितीय प्रहर में दुग्धाभिषेक, तृतीय प्रहर में घृताभिषेक और चतुर्थ प्रहर में शहद और बिल्व पत्र का अर्पण किया जाता है। जलाभिषेक अहंकार और बाहरी मलीनताओं को धोने, दुग्धाभिषेक मन और चित्त की शुद्धि, घृताभिषेक साधक के भीतर तेज और स्थिरता का संचार करने तथा शहद और बिल्व पत्र के अर्पण से आनंद, समर्पण और पूर्णता का लक्ष्य माना जाता है।
88 वर्षों से चल रही परम्परा – शिवरात्रि के महापर्व पर यहाँ पिछले 88 वर्षों से शास्त्रीय संगीत के माध्यम से भगवान शिव की आराधना करने की परम्परा चली आ रही है जिसमें इस अंचल के प्रख्यात उस्ताद अमीर खां और कुमार गंधर्व से लेकर अनेक प्रमुख शास्त्रीय गायक भगवान शिव के दरबार में अपनी प्रस्तुतियां दे चुके हैं।
इस वर्ष भी 15 फरवरी को शाम 7 बजे से शास्त्रीय संगीत निशा में विदुषी शोभा चौधरी का शास्त्रीय गायन होगा जिसमें तबले पर संगत मुकेश रासगाय और हारमोनियम पर राजेंद्र जोशी करेंगे। इसी तरह शास्त्रीय वायलिन वादन की प्रस्तुति ब्रजमोहन भमरेले देंगे और तबले पर संगत गांधार राजहंस करेंगे। इस अवसर पर प्रख्यात तबला वादक पं. दिनेश शुक्ल एवं सारंग लासुरकर एकल प्रस्तुति भी देंगे। महोत्सव की व्यापक तैयारियां जारी हैं।

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सुबह 3 बजे मुहूर्त आरती होगी – इस बार भी शिवरात्रि के उपलक्ष्य में 15 फरवरी को प्रातः 3 बजे ब्रह्म मुहूर्त आरती के साथ भगवान शिव की पूजा अर्चना का क्रम प्रारंभ होगा। रात्रि 12 बजे महानिशा पूजन एवं आरती तथा रात 12.30 बजे भक्ति गीत एवं चारों प्रहर कीर्तन रात्रि जागरण के साथ होगा। मंदिर पर इन सभी कार्यक्रमों के लिए विशेष प्रबंध किए जा रहे हैं।

 

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