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इंदौर

सुख और दुख हमारे कर्मो का फल है।

जीवन को मोक्ष की ओर प्रवृत्त करना है तो भागवत की शरण जरूरी : पं. शास्त्री

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जीवन को मोक्ष की ओर प्रवृत्त करना है तो भागवत की शरण जरूरी : पं. शास्त्री

लोहारपट्टी स्थित खाड़ी के मंदिर पर चल रहे सात दिवसीय संगीतमय भागवत ज्ञानयज्ञ में उमड़ रहा भक्तों का सैलाब

इन्दौर, । स्वयं भगवान के श्रीमुख से जिस ग्रंथ की रचना हुई हो, वह कालजयी ग्रंथ ही होता है। भारत भूमि ही वह स्थान है जहां इतनी बड़ी संख्या में देवी-देवता अवतार लेकर इस सृष्टि का संचालन करते हैं। भागवत को चाहे कल्पवृक्ष कह लें, या महासागर अथवा सदगुणों का भंडार – सबका सार यही है कि जीवन को मोक्ष की ओर प्रवृत्त करना है तो भागवत की शरण जरूरी है। भागवत वह कथा है जिसमें जीवन की सभी समस्याओं का समाधान मौजूद है।

भागवत भूषण आचार्य पं. राजेश शास्त्री के, जो उन्होंने लोहारपट्टी स्थित श्रीजी कल्याण धाम, खाड़ी के मंदिर पर हंसदास मठ के पीठाधीश्वर श्रीमहंत स्वामी रामचरणदास महाराज एवं महामंडलेश्वर महंत पवनदास महाराज के सानिध्य में चल रहे भागवत ज्ञानयज्ञ में परीक्षित जन्म प्रसंग के दौरान व्यक्त किए। कथा शुभारंभ के पूर्व अजय व्यास, संजय शर्मा, लीलाधर शर्मा, सुनील जैन पांडू, ताने शर्मा, सुजीत गणेश्वर, रामकुमार शर्मा, संजय पंडित, राजेश शास्त्री सहित अनेक श्र्द्धालुओं ने व्यास पीठ का पूजन किया। राधा रानी महिला मंडल की बहनों ने श्रीमती वर्षा शर्मा, रुक्मणी शर्मा, उषा सोनी, श्रेया शर्मा, श्रुति शर्मा, गीता व्यास, वेदांत शर्मा, चंदा खंडेलवाल, बबली खंडेलवाल, निर्मला सोलंकी, मधु सुगंधी, उर्मिला प्रपन्न, हंसा पंचोली, हेमलता वैष्णव, मधु गुप्ता के साथ आचार्यश्री की अगवानी की। कथा में आज भी भक्तों का सैलाब बना रहा। भजनों पर श्रद्धालुओं द्वारा नाचने गाने का क्रम भी निरंतर जारी है। मठ के पं. अमितदास महाराज ने बताया कि भागवत ज्ञान यज्ञ का यह क्रम 30 दिसम्बर तक प्रतिदिन दोपहर 4 से सायं 7 बजे तक जारी रहेगा। इस दौरान श्रीकृष्ण जन्मोत्सव, गोवर्धन पूजा, रुक्मणी विवाह एवं सुदामा चरित्र जैसे उत्सव भी मनाए जाएंगे। मंदिर का वार्षिक अन्नकूट महोत्सव 31 दिसम्बर बुधवार को आयोजित होगा।

भागवताचार्य पं. शास्त्री ने कहा कि सुख और दुख हमारे कर्मो का फल है। हम जैसे कर्म करेंगे, फल भी वैसे ही मिलेंगे। भगवान के शब्दकोष में सुख या दुख नाम का कोई शब्द है ही नहीं। भगवान के अवतार सज्जनों के कल्याण और दुर्जनों के विनाश के लिए ही होते हैं। गंगा और अन्य नदियां तभी तक पूजनीय है, जब तक वे अपने किनारों की मर्यादा में बहती है। किनारे छोड़ने पर कोई भी उन्हें नहीं पूजता क्योंकि तब वही जीवनरेखा विनाश की बाढ़ लेकर आती है। मनुष्य के जीवन का भी यही सिद्धांत है।

 

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