
स्वार्थ और मोह माया से बंधे रिश्ते ज्यादा दिनों तक नहीं चलते : पं. शास्त्री
लोहारपट्टी स्थित खाड़ी के मंदिर पर चल रही भागवत कथा में कृष्ण सुदामा मिलन की भावपूर्ण व्याख्या, आज शाम अन्नकूट
इन्दौर। कृष्ण और सुदामा की मित्रता पूरी दुनिया में अनूठा उदाहरण है। मित्रता के नाम पर स्वार्थ और मोह-माया से बंधे रिश्ते ज्यादा दिनों तक नहीं चलते। कृष्ण-सुदामा जैसा मैत्री भाव आज पूरे विश्व की जरूरत है। यह भारत भूमि का ही पुण्य प्रताप है कि यहां कृष्ण जैसे राजा और सुदामा जैसे स्वाभिमानी ब्राह्मण हुए। कलियुग में मित्रता को नए सिरे से परिभाषित करने की जरूरत है। ऊंचे पदों पर बैठे लोगों को अपने बाल सखाओं के दुख-दर्द में भागीदार बनने का संदेश भी इस प्रसंग से मिलता है।
भागवत भूषण आचार्य पं. राजेश शास्त्री के, जो उन्होंने लोहारपट्टी स्थित श्रीजी कल्याण धाम, खाड़ी के मंदिर पर हंसदास मठ के पीठाधीश्वर श्रीमहंत स्वामी रामचरणदास महाराज एवं महामंडलेश्वर महंत पवनदास महाराज के सानिध्य में चल रहे भागवत ज्ञानयज्ञ में कृष्ण सुदामा चरित्र प्रसंग की व्याख्या के दौरान व्यक्त किए। कथा में सुदामा एवं कृष्ण के बीच निश्छल और निःस्वार्थ मित्रता का भावपूर्ण उत्सव भी मनाया गया। कथा में राज्य के नगरीय विकास मंत्री कैलाश विजयवर्गीय, पूर्व विधायक सुदर्शन गुप्ता, एमआईसी सदस्य निरंजनसिंह चौहान गुड्डू, साईं भक्त हरि अग्रवाल, कमलेश खंडेलवाल, कमलेश गुप्ता, अक्षय बम, सुभाष दुबे, गोपाल भारद्वाज सहित अनेक श्रद्धालुओं ने व्यास पीठ का पूजन किया और आरती में भी भाग लिया। विजयवर्गीय ने भक्तों के आग्रह पर मनोहारी भजन भी सुनाया। राधा रानी महिला मंडल की ओर से श्रीमती वर्षा शर्मा, गीता व्यास, उषा सोनी, चंदा खंडेलवाल, बबली खंडेलवाल, निर्मला सोलंकी आदि ने आचार्यश्री एवं मेहमानों की अगवानी की।
आज अन्नकूट – मंदिर के पं. अमितदास महाराज ने बताया कि वार्षिक अन्नकूट महोत्सव बुधवार 31 दिसम्बर को शाम 6.30 बजे भोग श्रृंगार, आरती के साथ प्रारंभ होगा। लोहारपट्टी स्थित खाड़ी के मंदिर पर कल्याणजी एवं संकटहरण हनुमानजी को समर्पित यह अन्नकूट महोत्सव हंस पीठाधीश्वर महंत रामचरण दास महाराज के सानिध्य में होगा। इसके पूर्व भागवत ज्ञान यज्ञ की पूर्णाहुति भी होगी।
भागवत भूषण आचार्य पं. शास्त्री ने कहा कि भागवत एक ऐसा ग्रंथ है जो बार-बार श्रवण के बाद भी नित्य नूतन अनुभूति प्रदान करता है। जितनी बार सुनों, उतनी बार नया। दुनिया का और कोई ग्रंथ ऐसा नहीं है जो बार बार सुना जाए। जन्म जन्मांतर के पापों का क्षय करने के लिए यदि भूल से भी भागवत का कोई मंत्र सुन लिया जाए तो उसका पुण्य अवश्य मिलता है। यह वह कल्पवृक्ष है जिसकी छाया में पहुंचने पर हर शुभ संकल्प साकार हो जाता है।



