
*मनुष्य कर्मों से श्रेष्ठ होता है*
*संकुचित बुद्धि परमात्मा में विलीन होने से रोकती है*
*सुदामा चरित्र में बही अश्रु धारा*

इंदौर ।भगवान जब भी मनुष्य के रूप में जन्म लेते हैं तो वह सभी कार्य संपन्न करते हैं जो एक सामान्य मानव करता है हम लोग एक कमरे में बंद होकर संकुचित होकर रहते हैं हमारी बुद्धि में जब तक परमात्मा विराजमान नहीं होते तब तक हमारा कल्याण संभव नहीं है यह हमारा परम कर्तव्य है कि हम स्त्री पुरुष के भेद भूलकर भगवान के पाणिग्रहण संस्कार में अपने आप को लीन कर दें। जब तक जीवन में भेद बुद्धि का त्याग नहीं करेंगे तब तक हमारा कल्याण नहीं होगा उपरोक्त विचार पाराशर नगर में चल रही भागवत कथा में आज श्री यतींद्राचार्य जी ने व्यक्त किये। उन्होंने कहा जब तक हम ईश्वर की कथाओं लीलाओं का अनुसरण नहीं करेंगे हमें सद्बुध्दि नहीं आएगी हम शरणागति को प्राप्त नहीं होंगे। मनुष्य को अपने दान का कभी अभिमान नहीं करना चाहिए कोई धनवान होने पर श्रेष्ठ नहीं होता श्रेष्ठता कर्मों से आती है वही मनुष्य परम भागवत होता है जो संपदा, वैभव ,ऊंचे कुल का अभिमान नहीं करता।

समिति के मनोहर सोनी एवं जयेश लाठी ने बताया कि आज भागवत कथा का अंतिम दिवस था इसमें युवराज स्वामी यतींद्राचार्य जी ने सुदामा प्रसंग को बड़े ही मार्मिक तरीके से श्रद्धालुओं को समझाया सुदामा एवं द्वारिका के कृष्ण रुक्मणी के रूप में मौजूद कलाकारों के अभिनय से वहां उपस्थित श्रद्धालुओं की आंखों से अश्रु धारा बह उठी। कथा के आखिरी में यज्ञ भी किया गया और पूर्णाहुति होने के पश्चात आरती एवं गोष्टी प्रसाद का वितरण भी किया गया आज प्रारंभ में विधायक मालिनी गोड ने व्यास पीठ का पूजन किया वहीं पदमा सोनी, सरलाहेड़ा, ज्योति नागोरी, अंकित, सचिन महेश्वरी उर्मिला लाठी आदि ने यज्ञ में पूर्णाहुति देकर अपने आप को धन्य समझा।



