.
विविध

आदिवासी विश्वास, प्रकृति और जीवन दर्शन से रूबरू कराएगा इंदौर में होने जा रहा ‘जात्रा-2026

दीवारों के ऊपर नहीं, आत्मा के भीतर उतरती है पिथोरा कला

.

दीवारों के ऊपर नहीं, आत्मा के भीतर उतरती है पिथोरा कला

दीवारों के ऊपर नहीं, आत्मा के भीतर उतरती है पिथोरा कला

आदिवासी विश्वास, प्रकृति और जीवन दर्शन से रूबरू कराएगा इंदौर में होने जा रहा ‘जात्रा-2026’

इंदौर।: कुछ कलाएँ देखने के लिए नहीं, महसूस करने के लिए होती हैं। पिथोरा भी ऐसी ही एक कला है, जो रंगों से ज्यादा विश्वास, रेखाओं से ज्यादा रिश्तों और चित्रों से ज्यादा जीवन का ताना-बाना बुनती है। मध्य प्रदेश के धार, झाबुआ और अलीराजपुर के आदिवासी अंचलों में जन्मी यह लोककला अब पहली बार इंदौर शहर को अपने करीब बुला रही है। इस सांस्कृतिक संवाद को जीवंत रूप देने जा रही है ट्राइबल फाउंडेशन द्वारा स्थापित पिथोरा आर्ट गैलरी, जो ‘जात्रा-2026’ के माध्यम से दर्शकों के सामने प्रस्तुत की जाएगी। जनजातीय सामाजिक सेवा समिति के तत्वावधान में 20 से 22 फरवरी, 2026 तक इंदौर के ऐतिहासिक गांधी हॉल परिसर में आयोजित होने वाले इस आयोजन में ट्राइबल फाउंडेशन द्वारा 25 से अधिक चुनिंदा पिथोरा पेंटिंग्स का प्रदर्शन किया जाएगा, जिनमें आदिवासी जीवन, आस्था और प्रकृति से जुड़े भाव सजीव रूप में उभरकर आएँगे। गौरतलब है कि पीआर 24×7, इस आयोजन का पीआर पार्टनर है।

IMG 20260202 WA0039 IMG 20260202 WA0040 IMG 20260202 WA0038 IMG 20260202 WA0037 IMG 20260202 WA0036

पिथोरा कोई सजावटी चित्रकला नहीं है। यह आदिवासी समाज की सामूहिक स्मृति है, उनकी आस्था है और सबसे विशेष, प्रकृति के साथ उनके रिश्ते की जीवित अभिव्यक्ति है। परंपरागत रूप से पिथोरा चित्र घरों की दीवारों पर तब बनाए जाते हैं, जब परिवार सुख, समृद्धि, स्वास्थ्य या किसी मन्नत के पूरा होने पर देवताओं को धन्यवाद देना चाहता है। यह कला किसी एक कलाकार की नहीं होती, बल्कि पूरे समुदाय की भागीदारी से जन्म लेती है।

जनजातीय सामाजिक सेवा समिति के अध्यक्ष देवकीनंदन तिवारी ने कहा, “पिथोरा चित्रों में घोड़े, सूर्य, चंद्रमा, पेड़, जानवर, खेत, उत्सव और देवी-देवताओं की आकृतियाँ दिखाई देती हैं। हर रंग, हर रेखा और हर प्रतीक का अपना एक अर्थ होता है। ये चित्र बताते हैं कि आदिवासी जीवन में प्रकृति सिर्फ संसाधन नहीं, बल्कि परिवार का हिस्सा है। ट्राइबल फाउंडेशन द्वारा प्रस्तुत की जा रही यह पिथोरा गैलरी दर्शकों को कुछ क्षणों के लिए आधुनिक शहर से निकालकर जंगल, मिट्टी और लोकविश्वास की दुनिया में ले जाएगी।”

जनजातीय सामाजिक सेवा समिति के कोषाध्यक्ष श्री गिरीश चव्हाण ने कहा, “यह गैलरी सिर्फ चित्रों की प्रदर्शनी नहीं, बल्कि शहर और आदिवासी संस्कृति के बीच एक जीवंत संवाद होगी। ट्राइबल फाउंडेशन के इस प्रयास के माध्यम से दर्शक यह समझ पाएँगे कि पिथोरा कला क्यों पीढ़ियों से जीवित है और आज के समय में इसकी प्रासंगिकता क्यों और भी बढ़ जाती है, जब हम अपनी जड़ों से लगातार दूर होते जा रहे हैं।”

‘जात्रा-2026’ में पिथोरा आर्ट गैलरी के साथ-साथ आदिवासी कलाकारों की कला एवं हस्तशिल्प प्रदर्शनी, जनजातीय समाज के पारंपरिक व्यंजनों के विशेष स्टॉल, विभिन्न अंचलों के जनजातीय एवं लोक नृत्यों की प्रस्तुतियाँ, भगोरिया पर्व पर आधारित फोटोग्राफी प्रदर्शनी तथा जनजातीय साहित्य और पारंपरिक परिधानों के स्टॉल भी आकर्षण का केंद्र होंगे। लेकिन पूरे आयोजन की आत्मा के रूप में ट्राइबल फाउंडेशन द्वारा सृजित पिथोरा आर्ट गैलरी अपनी शांति, गहराई और भावनात्मक प्रभाव के साथ दर्शकों को ठहरकर सोचने के लिए विवश करेगी।

यदि आप आदिवासी संस्कृति को केवल किताबों या तस्वीरों में नहीं, बल्कि सामने जीवित और स्पंदित रूप में देखना व महसूस करना चाहते हैं, तो ‘जात्रा-2026’ आपके लिए एक विशेष अवसर है। यहाँ पिथोरा कला आपको यह एहसास कराएगी कि कला केवल देखने की वस्तु नहीं, बल्कि जीने की एक गहरी और संवेदनशील भाषा भी हो सकती है।

Show More

Related Articles

Back to top button
error: Content is protected !!