
*अधिकारियों पर गैर इरादतन हत्या का केस दर्ज करने की मांग, इंदौर जिला न्यायालय ने दिए जांच के आदेश*
*अधिकारियों पर केस दर्ज करने का परिवाद दायर, कोर्ट ने बाणगंगा पुलिस को दिए जांच के आदेश*
*तानाशाह और भ्रष्ट अफसर हैं मौतों के जिम्मेदार, भागीरथपुरा के पीड़ित पहुंचे कोर्ट, जांच आदेश जारी*
*नगर निगम के अधिकारियों ने कमीशन के लिए नहीं जारी किया था टेंडर, सामने आया बड़ा तथ्य*
*भागीरथपुरा घटना में जो अधिकारी दोषी हैं उन पर कोई कार्यवाही नहीं हुई, पीड़ितों द्वारा न्यायालय में दायर परिवाद स्वीकृत, जांच का आदेश जारी*
*असली दोषी अधिकारी हैं, फाइल दबाए बैठे रहे इधर लोग मरते रहे, अब जिला कोर्ट ने दिए जांच के आदेश*
*इंदौर-।* भागीरथपुरा में दूषित पानी से हुई मौतों को लेकर लोगों का आक्रोश थमने का नाम नहीं ले रहा है।
धीर-धीरे जब हकीकत सामने आ रही है तो लोग इस त्रासदी के लिए नगर निगम के अधिकारियों को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं।
भागीरथपुरा के मोहता नगर के रहने वाले रामू पिता रुपसिंह ने विभिन्न समाचार पत्रों की खबरों का हवाला देते हुए बाणगंगा थाने में इसके लिए नगर निगम के अधिकारियों को जिम्मेदार ठहराते हुए उनके खिलाफ एफ.आई. आर. दर्ज करने की मांग की थी।
थाने में जब इसकी शिकायत दर्ज नहीं की गई तो उन्होंने अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए जिला कोर्ट की शरण ली है। कोर्ट में अधिवक्ता दिलीप नागर के माध्यम से परिवाद दायर किया गया है।
इसे स्वीकार करते हुए न्यायालय ने बाणगंगा पुलिस थाने को 24/01/26 तक जांच पूर्ण कर प्रतिवेदन प्रस्तुत करने का आदेश दिया है।
शिकायतकर्ता का कहना है कि उन्होंने पिछले 3 सालों से सीएम हेल्पलाइन से लेकर मेयर हेल्पलाइन तक घरों में आ रहे दूषित जल की शिकायत कई बार की।
शिकायत में यह स्पष्ट कहा गया कि घरों में नर्मदा जल की जगह मल-मूत्र वाला, बदबूदार पानी आ रहा है, लेकिन संबंधित अधिकारियों एवं कर्मचारियों ने कभी शिकायत को गंभीरता से नहीं लिया।
इनकी लापरवाही की वजह से क्षेत्र में 20 लोगों को अपनी जान गंवाना पड़ी और सैकड़ों लोग गंभीर बीमारी का शिकार हुए।
शिकायतकर्ता ने संबंधित दस्तावेजों का हवाला देते हुए कहा कि मेयर इन काउंसिल में 25 नवंबर 2022 को संकल्प क्रमांक 106 किया गया।
इसके पश्चात 24 नवंबर 2024 को इस संबंध ठहराव-प्रस्ताव हुआ था। आवश्यक कार्रवाई के लिए निविदा समिति को भेजा जाने वाला प्रपत्र 30 जुलाई 2025 को भेजा गया, लेकिन इसके बावजूद समय पर टेंडर जारी ना करते हुए नगर निगम के अधिकारियों ने घोर लापरवाही बरती है और जानबूझकर दूर्भावना से कार्य किया है।
निविदा समिति को भेजे जाने वाले पत्र दिनांक 30-07-2025 के आवश्यक टेंडर आदि समय से जारी नहीं करते हुए, अनावश्यक रूप से तत्कालीन निगम आयुक्त शिवम वर्मा एवं संबंधित अधिकारियों द्वारा लापरवाहीपूर्वक उक्त फाइल पर कोई कार्य समय पर नहीं किया गया।
संबंधित अधिकारी यदि अपने पदेन कर्तव्यों का निर्वहन समय रहते करते, तो उक्त जनहानि एवं बीमारी को रोका जा सकता था।
इस वजह से लोगों की अकाल मृत्यु हूई और सैकड़ों लोग अकारण बीमार हुए। अत: तत्कालीन नगर निगम कमीश्नर शिवम वर्मा, नगर निगम कमीश्नर दिलीप यादव, अपर आयुक्त रोहित सिसोनिया, जल वितरण कार्य विभाग के इंचार्ज सुपरिंटेंडिंग इंजीनियर संजीव श्रीवास्तव आदि पर गंभीर अपराध की धारा बीएनएस 105,106,125,127 में एफ. आई. आर. दर्ज की जाए।
क्योंकि अधिकारियों द्वारा जानबूझकर, दुर्भावनापूर्ण एवं भ्रष्ट मंशा से फाइल को लंबित रखा गया, जिसके परिणामस्वरूप दूषित जल आपूर्ति निरंतर जारी रही।
अब तक अलग अलग बातें सामने आ रही थीं लेकिन सच तो यह है कि नगर नियम आयुक्त और अपर आयुक्त की तानाशाही के आगे किसी की नहीं चल रही थी।
*सीएम हेल्पलाइन पर भी कई शिकायतें दर्ज थीं फिर भी बैखौफ थे अफसर*
क्षेत्र के लोगों ने बताया कि उन्होंने सीएम हेल्पलाइन पर भी शिकायतें दर्ज करा रखी थी लेकिन समाधान का कोई प्रयास नहीं हुआ इसका साफ मतलब है कि अधिकारियों को मुख्यमंत्री कार्यालय का भी भय नहीं था।
जो अधिकारी मुख्यमंत्री से नहीं डरते थे वे किसी की क्या सुनते?
*अधिकारियों पर कार्यवाही के बजाय पीठ थपथपाई जा रही*
इस पूरे घटनाक्रम में नगर निगम के आयुक्त एवं अपर आयुक्त की भूमिका पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े होते हैं।
जनभावना यह है कि प्रशासनिक स्तर पर मिलीभगत के बिना इतना बड़ा विलंब और लापरवाही संभव नहीं थी।
साथ ही, मुख्यमंत्री स्तर तक यह विषय पहुंचने के बावजूद इसे आवश्यक गंभीरता से नहीं लिया गया, जिससे जनता में आक्रोश और निराशा है।
इतनी बड़ी लापरवाही करने वाले तत्कालीन निगम आयुक्त को कलेक्टर बना दिया गया और घटना सामने आने के बाद भी वर्तमान आयुक्त को दंड देने के बजाय उप सचिव बनाया गया है।



